डेमोक्रेसी किसी की बपौती नहीं है I

लालू के दो बेटे हैं, दोनों 9वी फेल हैं I अपने एक बेटे को लालू ने उपमुख्यमंत्री बनाया है तो दूसरे को स्वास्थ मंत्री I क्या गजब का लोकतंत्र है जो दसवीं तक नहीं कर सके वो वो मंत्री बन कर हमारे भाग्यविधाता बन गए I एक हम जैसे युवा हैं जो गावं में पंचायत के चुनाव के लिए भी खड़े होंगे तो लोग बोलेंगे अभी परिपक्व नहीं हो, कुछ साल और इंतज़ार करो I गावं में तुमसे पहले कई हैं जो चुनाव लड़ने की पात्रता रखते हैं और एक तरफ नेता का बेटा, जो पैदा ही सीधा विधायक का चुनाव लड़ने के लिए हुआ है I
यही समाज जो हमे मना करते हैं चुनाव लड़ने से, नेता के नौसिखिये बेटो के आगे नतमस्तक होते हैं I उसे वोट डालते हैं I अगर हम सवाल करे की ये दोगलापन क्यों हैं हमारे साथ , तो बताते हैं तुम्हे कौन वोट देगा I तुम इस काबिल ही नहीं हो I हम पूछते हैं हम में ऐसी कौन सी खूबी नहीं हैं जो नेता की बेटे में ही है I
ग़ुलामी की ये मानसिकता पीड़ी दर पीड़ी चली आ रही हैं, हम में ये विश्वास पैदा ही नहीं किया जाता की कभी हम सोच भी सके, विधायक या सांसद का चुनाव लड़ने की I
ये एक ऐसा समाज हैं जहा नेता का एक अयोग्य लड़का/लड़की तो स्वीकार्य हैं , लेकिन जब उसी समाज में से कोई अपने जैसा चुनाव लड़ना चाहता हैं तो ये समाज ही उससे ईर्ष्या करता हैं, की हमारे बीच का कोई हमसे आगे कैसे बढ़ सकता हैं I
क्यों नहीं हम चुनाव में खड़े हो सकते और जीत सकते, अगर कोई साधारण परिवार का बच्चा क्लास का मॉनिटर बन सकता हैं तो वो आगे चलकर नेता भी बन सकता हैं I नेतृत्व क्षमता कोई विधा नहीं हैं जो किसी को सिखाई जा सके, ये इंसान अपने अंदर लेकर पैदा होता हैं और ये जरुरी नहीं की वो नेता का ही बेटा हो I
समाज ने न तो कभी खुद पे विश्वास किया और न ही किसी दूसरे के अंदर आत्मविश्वास पैदा होने दिया I एक आम लड़का फिर चाहे वो BJP हो या कांग्रेस में सोच भी नहीं सकता की उसे भी टिकट मिल सकता है वो इन पार्टियों में इसी में खुश रहता हैं की मंडल अध्यक्ष बन गए, युवा मोर्चा, युथ कांग्रेस का झुनझुना थमा दिया I ज्यादा हुआ तो गौ रक्षक मोर्चा क़े अध्यक्ष बन जाओ, RSS क़े प्रचारक बन जाओ I टिकट मिलेगा तो नेता को या उसके बेटे को I
क्या ख़ाक डेमोक्रेसी हैं ये I हम नहीं मानते ऐसे लोकतंत्र को जो सिर्फ नाम का हो I अब हमे इसे बदलना होगा, पहले खुद क़े अंदर फिर इस विश्वास पैदा करो की तुम नेताओ क़े बेटो की जी हजूरी क़े लिए नहीं बने हो, नेता का वजूद तुमसे हैं, तुम्हारा वजूद नेता से नहीं हैं I अपनी खुद की आइडेंटिटी बनाओ, पार्टी अगर न भी हो तो तब भी तुम्हारी पहचान अपनी वजह से हो समाज में I
और ये कोई मुश्किल काम नहीं हैं, बस बन बनाये समाज क़े ढर्रे को हिलाना हैं, ये भरबरा क़े खुद ही गिर जाएगा .और इस सोच को गिराने का समय अब आ चूका हैं I
जय हिन्द....जय भगत सिंह
सुमन ठाकुर, अधिवक्ता दिल्ली उच्च न्यायलय

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