मेरी कविता 'धर्म शोर करता है' जरूर पड़े I
धर्म शोर करता है,
जोर शोर से करता है
कभी जय श्री राम
कभी अल्लाह हो अकबर करता है,
ये कहता है ये 'अजान' है,
पहुचनी चाहिए
चाहे किसी का भी कान है
वो कहता है ये 'जगराता' है
तू चाहे, न चाहे
फिर भी तुझे पूरी रात जगाता है
तू इस्लाम को नहीं मानता
काफिर है तू, तेरा क्या हश्र करेंगे
ये तू भी नहीं जानता
तू हिंदुत्व को नहीं मानता
गद्दार है तू, पाकिस्तान है घर तेरा
और तू बोलने का हक़ है मांगता I
धर्म तेरा क्या करू
तुझको जीयु और कितना ज़हर पियूं
कभी टोपी, कभी तिलक लगाए
ये जो तेरा भक्त है
ये तेरे सिवा किसी की नहीं मानता I
कहता है निंदा नहीं चाहिए,
कोई आजाद ख्याल का
परिंदा नहीं चाहिए I
भेड़े चाहियें,
जो एक जुबां बोले,
मर जाएं,
पर मुँह न खोले
धर्म तुझे लेकर
घुटन भी है मुझमे,
विद्रोह भी है मुझमे
पर क्या करू,
मरने का डर भी है मुझमे I
एक सवाल भी है तुझसे 'धर्म'
कभी झांक अपने अतीत में,
मुझे नहीं पता
क्या मिलता है तेरी प्रीत में
कुछ तो रेहम कर
हिन्दू - मुस्लिम का
कुछ तो वहम दूर कर..........सुमन ठाकुर
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