भाजपा ने राष्ट्रपति पद के लिए एक दलित चेहरे को अपना उम्मीदवार बनाया
भाजपा ने राष्ट्रपति पद के लिए एक दलित चेहरे को अपना उम्मीदवार बनाया है I पार्टी के नेता बता रहे है कैसे भाजपा ने दलित वर्ग का सम्मान किया है और कैसे इससे दलितों के अधिकारों को सुरक्षा मिलेगी I सवाल ये है की क्या दलित किसी सवैधानिक पद पर बैठ कर सामाजिक समरसता या दलितों के प्रति समाज की सोच में बदलाव ला सकता है या नहीं I वो भी तब जब पद राष्ट्रपति का हो, जिसको की संसदीय शाषन प्रणाली में नाममात्र का मुखिया बताया गया हो I
आज पुरे देश में दलित आंदोलन अपने चरम पर है, फिर चाहे वो रोहित बेमुला, भीम आर्मी, ऊना की घटनायें हो..दलित संघर्षरत है I वर्तमान सरकार में कई दलित चेहरे है राम बिलास पासवान इनमे सबसे बड़ा नाम है लेकिन उन्होंने एक भी दलित आंदोलन का समर्थन नहीं किया I उनका सत्ता धर्म उन्हें ऐसा करने से रोकता है I
दलितों की लड़ाई आज नए चेहरे लड़ रहे है फिर चाहे गुजरात में जिग्नेश मेवानी हो या उत्तर प्रदेश में चंद्र शेखर.... इन आंदोलनों की ख़ास बात ये है की इनसे जुड़े लोग बाबा साहेब और उनकी नीतियों को अपना आदर्श मानते है I यानी की सविधान में उनकी अटूट आस्था है I जो की भारतीय लोकतंत्र के लिए ऐसे समय में एक शुभ संकेत है जब गौरक्षा और रोमियो स्क्वाड के नाम पर भारतीय सविधान की मूल भावना को ही नकारा जा रहा है I खैर बात हो रही थी क्या दलित के राष्ट्रपति बनने से कोई बदलाव आएगा I वर्तमान परिस्तिथियों को देखकर ऐसा नहीं लगता I दलितों को अपने अधिकारों की लड़ाई खुद की लड़नी होगी i
आज पुरे देश में दलित आंदोलन अपने चरम पर है, फिर चाहे वो रोहित बेमुला, भीम आर्मी, ऊना की घटनायें हो..दलित संघर्षरत है I वर्तमान सरकार में कई दलित चेहरे है राम बिलास पासवान इनमे सबसे बड़ा नाम है लेकिन उन्होंने एक भी दलित आंदोलन का समर्थन नहीं किया I उनका सत्ता धर्म उन्हें ऐसा करने से रोकता है I
दलितों की लड़ाई आज नए चेहरे लड़ रहे है फिर चाहे गुजरात में जिग्नेश मेवानी हो या उत्तर प्रदेश में चंद्र शेखर.... इन आंदोलनों की ख़ास बात ये है की इनसे जुड़े लोग बाबा साहेब और उनकी नीतियों को अपना आदर्श मानते है I यानी की सविधान में उनकी अटूट आस्था है I जो की भारतीय लोकतंत्र के लिए ऐसे समय में एक शुभ संकेत है जब गौरक्षा और रोमियो स्क्वाड के नाम पर भारतीय सविधान की मूल भावना को ही नकारा जा रहा है I खैर बात हो रही थी क्या दलित के राष्ट्रपति बनने से कोई बदलाव आएगा I वर्तमान परिस्तिथियों को देखकर ऐसा नहीं लगता I दलितों को अपने अधिकारों की लड़ाई खुद की लड़नी होगी i
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