वर्ण व्यवस्था: भारत का अभिशाप
जाति भारतीय समाज की धुरी है, हिंदस्तान का शाषक वर्ग इस कमजोरी से भली भांति परिचित है। हर जाती का अपना मनोविज्ञान है, जो उस समुदाय दुआरा बचपन से पीढ़ी दर पीढ़ी पढ़ाया जाता है।
हर जाती अपने इतिहास में कोई न कोई महान शख्शियत ढूंढती है और हम अपने इतिहास को इसी संकुचित दायरे में देखते है और अनुकरण करते हैं।
विश्व के किसी और भूखण्ड में वर्ण व्यवसथा नहीं है, लिहाजा ऐसा कोई उदाहरण कही और नही मिलता है।
हम जातियों के मकड़जाल में ऐसे उलझे है की खुद को हम एक देश के तौर पर बाद में देखते हैं और जातीय समुदाय के रूप में पहले।
हर जाती अपने इतिहास में कोई न कोई महान शख्शियत ढूंढती है और हम अपने इतिहास को इसी संकुचित दायरे में देखते है और अनुकरण करते हैं।
विश्व के किसी और भूखण्ड में वर्ण व्यवसथा नहीं है, लिहाजा ऐसा कोई उदाहरण कही और नही मिलता है।
हम जातियों के मकड़जाल में ऐसे उलझे है की खुद को हम एक देश के तौर पर बाद में देखते हैं और जातीय समुदाय के रूप में पहले।
यही से शुरुआत होती है एक कमजोर भारत की, हमारी निष्ठा देश के लिए नही जातियों में है।
कड़वा सच तो ये है की हमारा कोई गौरवशाली इतिहास नहीं रहा है, कुछ एक अपवादों को छोड़कर...
हमारी वर्ण व्यवसथा ने हमे एक नही होने दिया, और जो भी आये... हूण, मंगोल,तुर्क,मुगल,अंग्रेज, फ्रेंच, पुर्तगाली, उन्होंने हमें गुलाम बनाया, क्या हम ग़ुलाम बनने के लिए ही बने थे। ग़ुलामी की मानसिकता इतना घर कर कर गयी की हम आज लोकतंत्र में भी इसी को पोषित कर रहे हैं।
कड़वा सच तो ये है की हमारा कोई गौरवशाली इतिहास नहीं रहा है, कुछ एक अपवादों को छोड़कर...
हमारी वर्ण व्यवसथा ने हमे एक नही होने दिया, और जो भी आये... हूण, मंगोल,तुर्क,मुगल,अंग्रेज, फ्रेंच, पुर्तगाली, उन्होंने हमें गुलाम बनाया, क्या हम ग़ुलाम बनने के लिए ही बने थे। ग़ुलामी की मानसिकता इतना घर कर कर गयी की हम आज लोकतंत्र में भी इसी को पोषित कर रहे हैं।
पद्मावती पर एक पोस्ट लिखी थी जो कई दोस्तों को बुरी लगी, मैंने डिलीट कर दी, क्योंकि उनकी भावनाये आहत हुईं ।
लेकिन फिर भी कहूंगा की हम भावनात्मक मुद्दों को लेकर बहस छेड़े हुए हैं। वास्तविक मुद्दे गौण हैं, चर्चा के पटल से ये एक सोची समझी रणनीति के तहत गायब कर दिए गए हैं।
पद्मवाती से भंसाली की फिल्म को इतनी पब्लिसिटी मिल गयी जितनी उसे करोड़ो खर्च करके नही मिलती, गुमनाम सी करणी सेना भी राष्ट्रीय पटल पर आ गयी, कल को ये अघोषित पैरोकार बन जाएंगे राजपूत समाज के l
हमे इन सब के बीच में क्या मिला, कभी सोचा है, कल किसी और जाती की अस्मिता से जुड़ा मुद्दा आ जायेगा ।
हम अपनी मूड़ कल्पनाओं की स्मृतियों में अपनी आन बान और शान ढूंढते रहंगे और धनाढ्य पूंजीपति और शाषक वर्ग हम पर यूं ही अट्टहास करता रहेगा और मेरे जैसे चंद कुढ़ते रहेंगे।
Suman Thakur
पद्मवाती से भंसाली की फिल्म को इतनी पब्लिसिटी मिल गयी जितनी उसे करोड़ो खर्च करके नही मिलती, गुमनाम सी करणी सेना भी राष्ट्रीय पटल पर आ गयी, कल को ये अघोषित पैरोकार बन जाएंगे राजपूत समाज के l
हमे इन सब के बीच में क्या मिला, कभी सोचा है, कल किसी और जाती की अस्मिता से जुड़ा मुद्दा आ जायेगा ।
हम अपनी मूड़ कल्पनाओं की स्मृतियों में अपनी आन बान और शान ढूंढते रहंगे और धनाढ्य पूंजीपति और शाषक वर्ग हम पर यूं ही अट्टहास करता रहेगा और मेरे जैसे चंद कुढ़ते रहेंगे।
Suman Thakur
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